ढंग से जीने की वयवस्था का नाम ही है नैतिकता।
बिना बुधि ki naitikta anaitik se bhi badtar hoti hai
aur bina vayvktitv ki naitikta anaitik se bhi badtar hoti hai
Tuesday, February 15, 2011
Sunday, February 13, 2011
आधुनिकशिक्षा
आज उच्चस्तरीय शिक्षा ने जहाँ नव यूवकों को स्वयं को स्वाब्लाम्बित होने के योग्य बनाया तथा अंतररास्ट्रीय स्तर पर अपने आप को पहचानने लायक बनाया वहीँ इस शिक्षा ने भारतीय संगठित परिवार की अवधारणा को नकारने में सहयोग भी प्रदान किया। आज इस शिक्षा ने स्वयंवाद को स्थापित करने में सहायता की है , जिसने भारतीय पारिवारिक परंपरा छिन्न भिन्न कर दिया है। पुराणी पीढ़ी की परम्परावोंका अनुसरण करना ये बकवास मानते हैं। धीरे धीरे पश्चिम का अनुसरण करते हुए स्वयं के प्रति ही सोचते हैं न तो किसी पर आश्रित होते है और न ही किसी को आश्रित रखना चाहते हैं। ये अतीत को बेड़ियाँ समझतें हैं और परम्परावों को ढोंग। इन्हें वर्तमान अछालगता है और भविष्य के प्रति चिंतित नहीं हैं परंतु उसका मुकाबला करने के लायक समझतें हैं। ये संभव हो अच्छा लगता है। पर सच होगा इस पर शक है। क्योंकि पुराणी पीढ़ी ने अपने जीवन में बहोत उतार चढाव देखें हैं इसलिए वे इतनी मजबूती से नहीं कह सकते किभविष्य में क्या होगा। आज परिवार कि परिभाषा बदल गई है । अर्थात परिवार सीमित हो गया है। इससे समाज कि अवधारणा खत्महो रही है। जब समाज नहीं रहेगा तो जीवन जीने के जो कायदे बने थे उनमे भी परिवर्तन होगा। रिश्तों का स्थान ख़त्म होगा। और स्वार्थ नए रूप में स्थापित होगा बिना स्वार्थ के कोई किसी से परिचय नहीं बढ़ाएगा। और स्वार्थ की मात्र का निधारण उसका वयव्क्तितवकरेगा। अर्थात व्यक्ति प्रधान समाज का निर्माण होगा फिर इन नए व्यक्तियों का समूह एक नए समाज का निर्माण करेगा। जो पुराने से भिन्न होगा। उनके संस्कार आचरण पुरातन से भिन्न होगें।
Saturday, February 5, 2011
मिश्र में जन आन्दोलन
पिछले १२ दिनों से प्रेसिडेंट मुबारक को हटाने के लिए जो आन्दोलन वंहा की जनता ने छेड रखा है वो जनता का पिछले ३० सालों के कुसासन के खिलाफ दबा हुवा आक्रोश है। भारत में भी इस देश के राज्नेतावों ओर नौकरशाहों के खिलाफ आक्रोश भरा हुवा है कब चिंगारी भरक उठे कोई नहीं कह सकता परंतू ये होगा क्योंकि जनता वर्तमान वयवस्था से दुखी हो गई है महंगाई घूसखोरी देश का पैसा विदेशों में और बेरोजगारी की वजह से आम जनता के साथ होने वाले रोज मर्रा के लूट खसोट चोरी आदि की घटनावों से जनता निजात चाहती है। सरकारी महकमा कोई काम नहीं करता कोई ऑफिसर अपनी जवाबदारी नहीं समझ रहा जनता तड़प रही कोई सामने नहीं आरहा उनकी तख्लिफों को समझने वाला।
Tuesday, January 11, 2011
समाजवाद
समाजवाद लोगों को वर्गों में बांटता है याने गरीब समाज और अमीर समाज न क़ि वर्णों में वर्ण से साम्पर्दायिक भावनाएं उमड़ती हैं। समाजवाद शोषक और शोषित के फांसले को कम करता है, वो न तो मुस्लिम और हिन्दू न ही गरीब और अमीर के बीच झगडा करवाता है। उसकी लड़ाई तो गरीब और पिछड़ों के लिए ही है। जो शोषित वर्ग के द्वारा निर्मित है वो इस निर्माण को तोडना चाहता है। गरीब और अमीर के बीच क़ि खाई को मिटाने का संघर्ष ही समाजवाद है। सिर्फ समाजवादी चित ही साम्प्रदायिकता से मुक्ति का मार्ग है। अगर सम्प्रदाय टूटेगा तो वर्ण टूटेगा वर्ण टूटेगा तो जाति और जातियों के टूटने से जो समाज बनेगा वो इन्सान का होगा। जिससे इंसानियत जनम लेगी और इंसानियत से हबस कम होगी तो गरीबी और अमीरी का भेद कम होगा पूर्व में व्यक्ति समाज का अंग था। आज व्यक्तियों का जोड़ समाज है।
Saturday, November 27, 2010
बिहार विधानसभा चुनाव
२४ नवम्बर को जो नतीजे आये उसमे जितना बहुमत जनतादल ओर भाजपा को मिला है इतना आजाद भारत के इतहास में किसी को नहीं मिला। इससे जाहिर होता है जनता विकास चाहती है ओर इमानदार नेता उसे न तो जातचाहिए ओर न ही आरक्षण।
Friday, November 19, 2010
भारत महान
इस देश की आबोहवा को लोगों ने इतना गन्दा बना रखा है की जीवन सिर्फ जीने के लिए है चाहे कैसे भी जिया जाये। ये अवधारणा लेकर आदमी बेढंगे तरीके से जी रहा है।
पता नहीं इस देश के राजनेतावों, नौकरशाहों को क्या हो गया है। लाखो करोड़ों का घपला करने के बाद भी अपने आपको पाक साफ बताने का प्रयास करते हैं जिस देश में करोड़ों लोग भूखों मर रहे हों, जवानी अराजक बन रही हो वहां इस धन का संचय किसलिए। संचय ओर संकुचन दोनों ही प्रगति के लिए अवरोधक होते हैं। धन का संचय ओर बुद्धि का संकुंचन उस समाज,व्यक्ति, ओर देश के लिए सबसे बड़े अवरोधक होते हैं। पश्चिम ने इसको पहचाना ओर कभी इस को स्वीकार नहीं किया। यही कारन है की वहां के लोग खुशहाल हैं। अनिश्चयी , ओर असुरक्षित इन्सान ही इस बीमारी का शिकार होता है । धन का संचय ओर बुद्धि का संकुचन एक बीमारी है इससे दूर रहना चाहिए । इन दोनों का फैलाव प्रगति का ज्योतक है। ये भावना इस देश के कर्णधारों को स्वीकार करके देश में फैलाना चाहिए यही मेरा सोच है ।
पता नहीं इस देश के राजनेतावों, नौकरशाहों को क्या हो गया है। लाखो करोड़ों का घपला करने के बाद भी अपने आपको पाक साफ बताने का प्रयास करते हैं जिस देश में करोड़ों लोग भूखों मर रहे हों, जवानी अराजक बन रही हो वहां इस धन का संचय किसलिए। संचय ओर संकुचन दोनों ही प्रगति के लिए अवरोधक होते हैं। धन का संचय ओर बुद्धि का संकुंचन उस समाज,व्यक्ति, ओर देश के लिए सबसे बड़े अवरोधक होते हैं। पश्चिम ने इसको पहचाना ओर कभी इस को स्वीकार नहीं किया। यही कारन है की वहां के लोग खुशहाल हैं। अनिश्चयी , ओर असुरक्षित इन्सान ही इस बीमारी का शिकार होता है । धन का संचय ओर बुद्धि का संकुचन एक बीमारी है इससे दूर रहना चाहिए । इन दोनों का फैलाव प्रगति का ज्योतक है। ये भावना इस देश के कर्णधारों को स्वीकार करके देश में फैलाना चाहिए यही मेरा सोच है ।
Wednesday, November 17, 2010
भारत महान
ज्ञान का पिरोधा कहलाने वाला देश नए नए शब्दों का आविष्कारक इसीलिए बना क्योंकि इसने वह सब देखा ओर सहा परन्तु प्रतिकार नहीं किया। कोई क्रांति नहीं की पिछले ५००० सालों में कोई संघर्ष नहीं किया जो किसी बुराई को उखाड़ फेंके । प्रताड़ना ,निरंकुशता ,हिंसा, झूठ , फरेब, मोह, माया, क्रोध, लालच, पाखंड, जितने बुरे शब्द हैं सब यंहीं से पैदा हुए क्योंकि बहुसंख्यक लोग इन्ही गुणों के पोषक थे। तभी तो ये कहा जाता है की ये सब बुरे गुण हैं, सिर्फ कहा गया पर इसके उन्मूलन के लिए संघर्ष नहीं किया गया। भूत , भविष्य , वर्तमान, स्वर्ग , नरक, इन शब्दों की उत्पत्ति भी शायद यहीं हुई ओर सबसे बड़ा शब्द मोक्ष की उत्पत्ति भी यंहीं हुई। इसी मोक्ष शब्द ने इस देश के नागरिक की तररकी की भावना को रोक दिया। ठहरा दिया ,इसका पानी ठहर गया , उसमे काई जम गई , कीड़े पद गए। मोक्ष की कामना ने कर्महीन बना दिया । हर कदम पर इस शब्द के विश्लेषण ने उसे गति हीन बना दिया ये इस महाद्वीप का अभिशाप है। इस महाद्वीप से निकलने के बाद वही इन्सान उपरोक्त शब्दों को तिलांजलि दे देता है ओर कर्मशील बन कर दुनिया में नाम रोशन करता है।
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